
इंदौर दहेज प्रताड़ना केस में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां विवाह से करीब चार दशक पहले सांसारिक जीवन छोड़कर साध्वी बन चुकी ननद को भी दहेज प्रताड़ना के मामले में आरोपी बना दिया गया। साध्वी का लंबे समय से परिवार से संपर्क नहीं था और वह शिकायतकर्ता की शादी में भी शामिल नहीं हुई थी।
इसके बावजूद एरोड्रम पुलिस ने साध्वी को मामले में आरोपी बनाते हुए कोर्ट में चालान पेश किया था। मामला अपर सत्र न्यायालय पहुंचने पर कोर्ट ने रिकॉर्ड और आरोपों का परीक्षण किया। 13 अगस्त को न्यायालय ने साध्वी समेत अन्य परिजनों के खिलाफ निचली कोर्ट द्वारा तय किए गए आरोपों को निरस्त कर दिया।
शादी में शामिल नहीं हुई साध्वी, फिर भी बनाया आरोपी
मामले के अनुसार महिला ने इंदौर के एरोड्रम थाने में दहेज प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में पति के साथ उसके राजस्थान में रहने वाले भाई-भाभी और बहन को भी आरोपी बनाया गया था।
परिवार की ओर से पुलिस को जानकारी दिए जाने का दावा किया गया कि इन रिश्तेदारों का शिकायतकर्ता महिला से कोई संपर्क नहीं रहा। इसके बावजूद पुलिस ने जांच आगे बढ़ाते हुए आरोपियों के खिलाफ चालान कोर्ट में पेश कर दिया।
इंदौर दहेज प्रताड़ना केस में निचली कोर्ट ने तय किए थे आरोप
पुलिस द्वारा चालान पेश किए जाने के बाद प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी की कोर्ट ने साध्वी समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए थे। इसके बाद बचाव पक्ष ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अपर सत्र न्यायालय में रिवीजन पेश किया।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि जिन लोगों को आरोपी बनाया गया, उनकी शिकायतकर्ता से वास्तविक संपर्क और कथित प्रताड़ना में भूमिका से संबंधित पर्याप्त तथ्य रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं हैं।
1980 में बाल साध्वी के रूप में अपनाया था वैराग्य
बचाव पक्ष के एडवोकेट महेंद्र मौर्य ने कोर्ट को बताया कि पति की बहन ने वर्ष 1980 में बाल साध्वी के रूप में सांसारिक जीवन छोड़ दिया था।
वैराग्य लेने के बाद वह परिवार के संपर्क में नहीं रही। वह शिकायतकर्ता की शादी में भी शामिल नहीं हुई और बाद में भी परिवार के साथ उसका संपर्क नहीं रहा। इसी आधार पर बचाव पक्ष ने उसके खिलाफ दहेज प्रताड़ना के आरोप पर सवाल उठाया।
जेठ-जेठानी को भी बनाया गया था आरोपी
बचाव पक्ष के अनुसार शिकायत में आरोपी बनाए गए जेठ और जेठानी राजस्थान में रहते हैं। दावा किया गया कि वे भी शिकायतकर्ता की शादी में शामिल नहीं हुए थे।
इसके बावजूद दोनों को दहेज प्रताड़ना के मामले में आरोपी बनाया गया। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपियों की वास्तविक भूमिका और शिकायतकर्ता से उनके संपर्क की पर्याप्त जांच किए बिना कार्रवाई आगे बढ़ाई गई।
कोर्ट ने पूछा- प्रताड़ना कब, कहां और कैसे हुई?
अपर सत्र न्यायाधीश मनीष लोवंशी की कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि साध्वी, जेठ और जेठानी द्वारा शिकायतकर्ता को दहेज के लिए प्रताड़ित किए जाने से संबंधित ठोस आधार रिकॉर्ड पर सामने नहीं आया।
कोर्ट के अनुसार यह स्पष्ट नहीं था कि इन आरोपियों ने शिकायतकर्ता को कब, कहां और किस तरह दहेज के लिए प्रताड़ित किया। इसी आधार पर निचली कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने में त्रुटि पाई गई।
साध्वी समेत अन्य परिजनों के आरोप निरस्त
अपर सत्र न्यायालय ने निचली कोर्ट द्वारा साध्वी और अन्य संबंधित परिजनों के खिलाफ तय किए गए आरोपों को निरस्त कर दिया। कोर्ट के इस आदेश के बाद दहेज प्रताड़ना के मामलों में आरोपियों की भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच का मुद्दा भी सामने आया है।
दहेज प्रताड़ना के मामलों में जांच की भूमिका महत्वपूर्ण
दहेज प्रताड़ना से जुड़ी शिकायतें गंभीर प्रकृति की होती हैं। ऐसे मामलों में शिकायत में लगाए गए आरोपों के साथ प्रत्येक आरोपी की कथित भूमिका, संपर्क और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच महत्वपूर्ण होती है।
इस इंदौर दहेज प्रताड़ना केस में अपर सत्र न्यायालय के आदेश के बाद साध्वी समेत संबंधित परिजनों के खिलाफ निचली अदालत द्वारा तय किए गए आरोप निरस्त हो गए हैं।
FAQ
इंदौर दहेज प्रताड़ना केस में साध्वी को आरोपी क्यों बनाया गया था?
महिला द्वारा एरोड्रम थाने में दर्ज शिकायत में पति की बहन को भी आरोपी बनाया गया था। पुलिस ने जांच के बाद उसके खिलाफ भी चालान पेश किया था।
साध्वी ने कब वैराग्य लिया था?
बचाव पक्ष के अनुसार संबंधित महिला ने वर्ष 1980 में बाल साध्वी के रूप में सांसारिक जीवन छोड़ दिया था।
कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
अपर सत्र न्यायालय ने रिकॉर्ड में पर्याप्त आधार नहीं मिलने पर साध्वी समेत संबंधित परिजनों के खिलाफ निचली कोर्ट द्वारा तय किए गए आरोप निरस्त कर दिए।
📢 हमारे अन्य प्लेटफॉर्म से जुड़ें:
📞 खबरों व विज्ञापन के लिए संपर्क करें:
9977238238, 9977290137
